走进位于台湾台北市东边的一处老小区,一栋老旧公寓内,隐藏着一间影像工作室。女主人出面迎接,一席深蓝衣着,搭配朴素眼镜,声音婉约,她是36岁的台湾导演傅榆。四个月前,傅榆因为在金马奖上的一句获奖感言在两岸三地引发轩然大波。
四个月后,傅榆终于同意接受BBC中文采访。当谈到自己的电影和台湾政治时,傅榆谈兴颇浓,但当话题触及那场所谓的金马奖台独风波时,她出言谨慎甚至有些回避。在采访接近尾声时,承认在金马奖上发言内容是有所准备的她表示,如果还有机会的话,自己会想的更周全,尽量不要伤害到任何人。
时间倒退到2018年11月17日,台北市国父纪念馆里,正在举办一年一度的电影盛会——金马奖颁奖典礼。台湾女导演傅榆以《我们的青春,在台湾》获得最佳纪录片时,上台后的她一度难掩激动,在发表感言时,每一字每一句都稍作停顿,却相当清晰。
直到最后,她顿了顿,然后缓缓说出:“希望有一天我们的国家可以被当成一个真正独立的个体来看待,这是我身为台湾人最大的愿望。”
在现场收获满场掌声的这段发言立即引发争议——接下来上台的中国大陆演员,在致辞时纷纷强调“中国台湾”或“中国电影”等字眼。颁奖典礼结束后,几乎所有大陆演员都缺席了酒会。第二天,许多中国大陆艺人在社交网络上表态,甚至以“中国一点都不能少”为关键词发贴,强调中国对台湾的主权。
金马奖颁奖礼正值台湾地方选举前一周,两岸议题在台湾讨论正酣。在台湾,很多人称赞傅榆有勇气,说出许多台湾人的心声,连台湾总统蔡英文也公开声援她。
与此同时,对傅榆的负面评论也大量涌来,有人批评她打破了金马奖长期以来不谈政治的默契,可能会毁了金马奖。
傅榆承认自己专门准备了致辞,而不是随机感言。“但是在上台之前,的确脑袋里是一路以来的点点滴滴,从一开始认识他们(获奖片中男女主角),到后来我进入低潮不知道怎么结束,后来终于把它剪出来,这个过程经历了12个版本,每一个版本都是呕心沥血的结果。想到这个过程,想到终于……有机会被更多人看到的时候……现在想起来都还是会有点激动。”曾在致辞时泪流满面的傅榆再度哽咽。
记者追问傅榆对这场风波中各种不同声音的感想,她停顿片刻后轻轻说:“我到现在还是不太会回答这个问题。”
傅榆在沉思许久后对BBC中文说:“(金马奖发言后)大家都很觉得我是女战神、女战士,要去对抗什么,但真的不是这样。我讲这些话,对我来说就是,长久以来,身为一个台湾人,我想被尊重。”
“我们的国家”、“一个真正独立的个体”,这些傅榆的表述被很多人解读成“台独”宣言,但傅榆说:“后来的政治局势 ,让有些人用标签化来看待我的话,我觉得这真的是简化了,这不是我的本意。”她说自己也能了解大陆演员的难处。
傅榆说,自己在乎的是,能不能把每一个人甚至国家都当成是一个个体看待,在尊重彼此的前提下健康地对话。
然而,来自社会大众和舆论的反应,确实让傅榆一度难以招架。她说:“我不想去伤害人,但(结果)我还是伤害了,我也很难过。但如果还有机会的话,我会想的更周全,我希望考虑地更清楚、贴心,尽量不要伤害到任何人。”
情绪投射
傅榆成长在台北的阳明山与天母地区,父亲来自马来西亚马六甲的华侨世家,在当地华侨高中毕业后赴台湾念书,最后在一所台湾大学任教。母亲也来自印度尼西亚华侨家庭。在台北出生长大的傅榆,有着与一般台湾人不同的家庭背景。
上大学后,傅榆看到班上的同学会为了争辩统独议题而剑拔弩张,她开始尝试用镜头去回答 “台湾的蓝绿之间有没有对话的可能”。金马奖获奖纪录片《我们的青春,在台湾》是傅榆的第三部正式作品。 这部纪录片述说的,是一位台湾学生陈为廷与中国大陆在台留学生蔡博艺一同参与社运活动,并建立起革命感情的故事。片中的主角之一蔡博艺是首批来到台湾的陆生,对于台湾的政治活动充满好奇。
在傅榆纪录这两位社会背景不同的学生的同时,台湾社会运动的能量在2014年爆发。当年的“太阳花学运”,抗议学生占领国会议场,将台湾的社会运动推向新的层次,身为学运领袖之一的陈为廷,一夕间成为家喻户晓的大人物。蔡博艺则私底下会偷偷探望陈为廷,并且在一线观察学运。
这些过程被傅榆纪录下来。随后,陈为廷爆红所带来的名声让他自己也有点难以适从。面对汹涌的抗议人群,如何决策,如何做出下一步,何时该撤出国会等,都一度让陈为廷备感焦虑。他甚至在面对傅榆镜头时吐露心声:“我真的畏惧民主。”
Thursday, March 21, 2019
Thursday, March 7, 2019
पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी, EU ने कहा-नहीं कर सकते कश्मीर पर मध्यस्थता
पाकिस्तान को गुरुवार को तब बड़ा झटका लगा जब लक्जमबर्ग और यूरोपिय यूनियन (ईयू) ने एक सुर में कश्मीर मामले पर मध्यस्थता करने से मना कर दिया. पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान दुनिया में अलग-थलग पड़ गया है. उसने भारत के खिलाफ आवाज उठाने के लिए कश्मीर मुद्दे को फिर से सुलगाना शुरू कर दिया है. इसी क्रम में पाकिस्तान ने कई देशों से कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता की गुजारिश की है लेकिन उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया है.
मध्यस्थता को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में लक्जमबर्ग के मंत्री जिन एस्सेलबॉर्न ने कहा कि ऐसा नहीं लगता कि कश्मीर मुद्दा सुलझाने के लिए ईयू में कोई क्षमता है. पाकिस्तानी विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने भी एस्सेलबॉर्न से कुछ ऐसा ही सवाल किया कि क्या ईयू यह मुद्दा सुलझाने में दिलचस्पी रखता है? इस पर एस्सेलबॉर्न ने स्पष्ट जवाब दिया कि उनके पास मध्यस्थता करने की क्षमता नहीं है.
इससे पहले संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत शुरू करवाने की अपनी क्षमता पर संदेह जताया था. हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई थी कि भारत और पाकिस्तान अपनी अहमियत को समझते हुए एक अच्छी बातचीत करेंगे.
गुटेरेस ने कहा, "मैं दोनों देशों के बीच वार्ता के संबंध में मध्यस्थता की पेशकश करता रहा हूं, लेकिन अभी तक सफलता की कोई स्थिति पैदा नहीं हुई है." उन्होंने कहा, "भारत और पाकिस्तान दोनों की अंतरराष्ट्रीय मामलों में महत्ता है, इसलिए मैं उम्मीद करता हूं कि दोनों देश एक अर्थपूर्ण वार्ता करने में सक्षम होंगे."
भारत शुरू से पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्ता के लिए संयुक्त राष्ट्र या किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से इनकार करता रहा है. भारत का मानना है कि 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुए शिमला समझौते में इस बात पर समझौता हुआ था कि दोनों देश अपने विवाद आपस में सुलझाएंगे, न कि तीसरा पक्ष इसमें शामिल होगा.
हालांकि अभी हाल में रूस और अमेरिका जैसे देशों ने भारत और पाकिस्तान के बीच पनपे तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पेशकश की थी. पहले भी ऐसी खबरें आई थीं कि रूस दोनों देशों के बीच तनाव कम करने में मदद के लिए वार्ता की मेजबानी कर सकता है. समाचार एजेंसी तास ने लावरोव के हवाले से कहा, "निश्चित रूप से, अगर वे ऐसा चाहें तो." विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जाखारोवा ने भी कहा कि मास्को, भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को कम करने में मदद के लिए कुछ भी करने को तैयार है.
मध्यस्थता को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में लक्जमबर्ग के मंत्री जिन एस्सेलबॉर्न ने कहा कि ऐसा नहीं लगता कि कश्मीर मुद्दा सुलझाने के लिए ईयू में कोई क्षमता है. पाकिस्तानी विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने भी एस्सेलबॉर्न से कुछ ऐसा ही सवाल किया कि क्या ईयू यह मुद्दा सुलझाने में दिलचस्पी रखता है? इस पर एस्सेलबॉर्न ने स्पष्ट जवाब दिया कि उनके पास मध्यस्थता करने की क्षमता नहीं है.
इससे पहले संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत शुरू करवाने की अपनी क्षमता पर संदेह जताया था. हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई थी कि भारत और पाकिस्तान अपनी अहमियत को समझते हुए एक अच्छी बातचीत करेंगे.
गुटेरेस ने कहा, "मैं दोनों देशों के बीच वार्ता के संबंध में मध्यस्थता की पेशकश करता रहा हूं, लेकिन अभी तक सफलता की कोई स्थिति पैदा नहीं हुई है." उन्होंने कहा, "भारत और पाकिस्तान दोनों की अंतरराष्ट्रीय मामलों में महत्ता है, इसलिए मैं उम्मीद करता हूं कि दोनों देश एक अर्थपूर्ण वार्ता करने में सक्षम होंगे."
भारत शुरू से पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्ता के लिए संयुक्त राष्ट्र या किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से इनकार करता रहा है. भारत का मानना है कि 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुए शिमला समझौते में इस बात पर समझौता हुआ था कि दोनों देश अपने विवाद आपस में सुलझाएंगे, न कि तीसरा पक्ष इसमें शामिल होगा.
हालांकि अभी हाल में रूस और अमेरिका जैसे देशों ने भारत और पाकिस्तान के बीच पनपे तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पेशकश की थी. पहले भी ऐसी खबरें आई थीं कि रूस दोनों देशों के बीच तनाव कम करने में मदद के लिए वार्ता की मेजबानी कर सकता है. समाचार एजेंसी तास ने लावरोव के हवाले से कहा, "निश्चित रूप से, अगर वे ऐसा चाहें तो." विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जाखारोवा ने भी कहा कि मास्को, भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को कम करने में मदद के लिए कुछ भी करने को तैयार है.
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